30 साल, 100 से ज्यादा फिल्में; क्या अक्षय कुमार में अब भी बचा है ‘खिलाड़ी’!


बॉलीवुड फिल्मों की बखिया उधेड़ने का खतरनाक शगल, दिल्ली के आखिरी हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर बनी बॉलीवुड फिल्म ‘पृथ्वीराज’ के रिलीज होते समय भी चरम पर था. फिल्म को अलग-अलग, खासकर सियासी चश्मों से देख रहे आलोचक या ट्रोल्स इसकी कहानी या प्रस्तुतिकरण के साथ-साथ इसके नायक अक्षय कुमार के ‘बुढ़ापे’ का जिक्र करना नहीं भूल रहे थे. मुहम्मद गोरी से हुई जंग के समय पृथ्वीराज चौहान की उम्र क्या रही होगी, इस ऐतिहासिक तथ्य के साथ अक्षय पर तंज कसे जा रहे थे. इतिहास के तथ्यों को देखें, तो उम्र की बात करना गलत नहीं है. फिल्म के कास्ट-सेलेक्शन से जुड़े लोगों ने इस तथ्य की बिल्कुल अनदेखी की थी. हॉलीवुड के धमाकेदार या दक्षिण की ‘बाहुबली’नुमा फिल्म देख चुके दर्शकों के लिए ‘पृथ्वीराज’ के एक्शन सीन्स भी नए नहीं थे. लिहाजा ट्रोल तो होना ही था. मगर इन ट्रोल्स की ‘बू’ में पृथ्वीराज के लिए सही नायक चुनने से ज्यादा, ‘अक्षय को क्यों चुना…’ वाला सवाल ज्यादा था. क्या अक्षय की जगह, दूसरा नायक होता तो फिल्म सफल हो जाती? इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती.

अक्षय कुमार के फिल्मों की, उनके ट्वीट्स की, उनके वक्तव्यों की…, हर बात की आलोचना की जा सकती है. होनी भी चाहिए. लेकिन क्या इसे भूलना चाहिए कि हिंदी फिल्मों में धड़कनें रोक देने वाला एक्शन सीन्स इस ‘खिलाड़ी कुमार’ के आने के बाद ही शुरू हुआ. कोई शक नहीं कि उनसे पहले भी फिल्मों के हीरो ढिशुम-ढिशुम किया करते थे, मार्शल आर्ट ट्रेंड कलाकार भी थे, मगर अक्षय कुमार को एक्शन में देखना रोमांच से भर देता था. पिछली सदी में आई खिलाड़ी-सीरीज की फिल्में हों या नई सदी के शुरू होते ही पहले हास्य और फिर खलनायक की भूमिकाओं में अक्षय ने आपको प्रभावित न किया हो तो बताइए? कलाकार के ‘शेड्स’ उनकी हैसियत नापने का पैमाना है. ‘संघर्ष’, ‘हेरा-फेरी’, ‘अजनबी’, ‘गरम मसाला’ और ‘पैड-मैन’ जैसी कई फिल्में हैं, जिसमें अक्षय कुमार ने क्या किया है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं.

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अक्षय कुमार की तारीफ में कही गई ये बातें, उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के उम्दा कलाकारों की श्रेणी में खड़ा नहीं करती हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अक्षय जैसे तमाम कलाकारों को ये शोहरत बख्शी है. शोहरत की धारा में जो ‘टाइप्ड’ हो गए, मायानगरी ने उन्हें जमीन दिखाने में भी दो पल नहीं लगाए हैं. मगर आजकल माहौल बदल गया है. अक्षय इसी माहौल का कभी लाभ उठाते दिख रहे हैं, तो ज्यादातर उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा है. साल 2022 या उसके पहले आई उनकी एक के बाद एक फ्लॉप फिल्मों का चार्ट देखें, तो आपको लगेगा ही नहीं कि यह वही अक्षय कुमार है. उसके पहले भी ‘बाला ओ बाला…’ या ऐसे ही गानों पर नए-नवेले कलाकार की तरह ठुमकते हुए अक्षय भले ही यह बताने की कोशिश करते हैं कि वे 20 साल पहले वाले अक्षय हैं, लेकिन दर्शक नहीं मान रहे. यह बात अक्षय को भी समझनी होगी.

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मार्शल आर्ट में ट्रेंड अक्षय की पर्सनल लाइफ भी काफी सफल है. (फोटो साभार: akshaykumar/Instagram)

बदले माहौल में भी डटे हैं
दरअसल, पहले 2020 में आई कोरोना महामारी और फिर सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद ड्रग्स या नेपोटिज्म जैसे विवादों ने बॉलीवुड के प्रति फिल्मी दर्शकों के साथ-साथ आम लोगों का नजरिया बदला है. इसी दौरान ‘बाहुबली’ की सफलता के रथ पर सवार दक्षिण भारतीय फिल्में हिंदी पट्टी में जगह बनाने लगीं, देश के राजनीतिक हलचल का असर फिल्म कलाकारों पर पड़ा और हमने इन अदाकारों को सिर्फ कला के चश्मे से देखना बंद कर दिया. निदा फाजली का एक शेर है, ‘हर चेहरे में होते हैं दस बीस चेहरे, जिसको भी देखो बार-बार देखो’. पिछले कुछ वर्षों में आम हिंदी फिल्मी दर्शकों ने इस शेर के बरक्स ही फिल्मी कलाकारों के साथ व्यवहार करना शुरू कर दिया है. अक्षय कुमार और उनसे बड़े या छोटे कलाकार भी इसी बिंदु पर आंक लिए जा रहे हैं.

अक्षय कुमार की हालिया फिल्मों की बात करें तो तमाम फ्लॉप के बाद भी ये आदमी, ‘कटपुतली’ जैसी फिल्म करता है. सस्पेंस या सामान्य रोमांटिक फिल्मों के विषय से हटकर. यह फिल्म आपको अच्छी लगी या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन अक्षय कुमार के भीतर का कलाकार उन्हें सिर्फ ‘पृथ्वीराज’ तक सीमित नहीं रखे है, ‘कटपुतली’ इसका प्रमाण है. जिस तरह शाहरुख, आमिर और सलमान ‘शांत पड़े हैं’, अक्षय ने इस फिल्म के जरिये बताया है कि अभी यह अभिनेता सिनेमा के पर्दे से हटने वाला नहीं है. ‘बच्चन पांडेय’ और ‘रक्षाबंधन’ जैसी फ्लॉप फिल्मों के बाद भी इसे पुराने ‘खिलाड़ी’ का अनुभव कह लें या जिजीविषा, अक्षय कुमार मनोरंजन करने के अपने ‘कर्तव्यपथ’ पर डटे हैं.

Best Before की जिद
अपने इस ‘खिलाड़ीपन’ को बचाए रखने की जिद अक्षय कुमार में तब भी दिखती है, जब वे इमरान हाशमी और बिलाल सिद्दीकी की किताब ‘दि किस ऑफ लाइफ’ की भूमिका लिख रहे होते हैं. इसमें अक्षय ने लिखा है, ‘मैं, मेरा परिवार, मेरे जानने वाले…, हमेशा साथ रहेंगे, इस सोच के साथ जीना भ्रम है. इसे बदलने की जरूरत है. दरअसल, सुपरमार्केट में बिकने वाली दूध की बोतलें और हमारे बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है. उन बोतलों के ऊपर साफ-साफ लिखा होता है Best Before यानी इनके इस्तेमाल की आखिरी तारीख क्या है, जबकि हमारी आखिरी तारीख कब है? कोई नहीं जानता. मृत्यु की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. इंसानों की ‘एक्सपायरी-डेट’ कब है, कोई नहीं जानता. इसलिए जब तक आप हैं, अपना संपूर्ण जीवन खुशी से जिएं. बच्चों के साथ रहें, बुजुर्गों संग समय बिताएं. यही आपके और आपके अपनों के वजूद को बचाए रखेगी.’ बॉलीवुड एक्टर इमरान हाशमी के बेटे को कैंसर हुआ. इस खतरनाक बीमारी से ही अक्षय कुमार के पिता की भी मौत हुई थी. इस बीमारी से किसी अपने की मौत का असर क्या होता है, अक्षय यह जानते हैं. बॉलीवुड में 3 दशक से ज्यादा समय तक उनके बने रहने के पीछे का संघर्ष, उनकी इन बातों से समझा जा सकता है.

Tags: Akshay kumar, Film industry



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